महिला सशक्तिकरण संघ जिला राजनांदगांव द्वारा भारत की प्रथम शिक्षिका सावित्री बाई फूले जयंती ग्राम-करेठी में मनायी गई।
त्वरित ख़बरें - दीपमाला शेट्टी रिपोर्टिंग

राजनांदगांव। महिला सशक्तिकरण संघ जिला राजनांदगांव द्वारा से ०१ जनवरी शौर्य दिवस ०३ जनवरी सामाजिक क्रांति की महानायिका प्रथम महिला शिक्षिका सावित्री बाई फूले जयंती एवं पौष पूर्णिमा ग्राम करेठी में मनायी गई। कार्यक्रम का प्रारंभ अतिथियों द्वारा महापुरूषो के तैल चित्रो के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर माल्यार्पण किया गया। पौष पूर्णिमा के अवसर पर ग्रामवासियों द्वारा खीर वितरण किया गया। कार्यक्रम में महिला सशक्तिकरण संघ जिला राजनांदगांव, दुर्ग, बालोद, दल्ली राजहरा के सदस्य उपस्थित हुए।

महिला सशक्तिकरण संघ द्वारा आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए महिला सशक्तिकरण संघ की प्रदेश अध्यक्ष प्रज्ञा बौद्ध जी ने कहा ०१ जनवरी १८१८ भीमा कोरेगाँव शौर्य दिवस पर प्रकाश डाला। शुरवीर अपने पूर्वजो जिन्होंने अपने ऊपर किये गये अन्याय एवं अत्याचार का बदला लेने के लिये रसद व अस्त्र शस्त्र की कमी के बावजुद ५०० सैनिकों ने पेशवा की सेना २८,००० को परास्त कर अपने पूर्वजों के अपमान का बदला लिया और हमें नरकीय जीवन से मुक्ति दिलायी। बाबा साहेब आम्बेडकर ने प्रत्येक महिला के लिए संविधान में अधिकार दिये जिसके कारण आज महिलाएं हर क्षेत्र में अपने आपको प्रतिस्थापित कर सकी।

अतिथि  नंदा मेश्राम जी,  नीता रामटेके, दिलीप मेश्राम, ओमप्रकाश बोरकर, चमन लाल कांडे, पुरषोत्तम मोटघरे जी ने कहा कि माता सावित्री बाई फूले का जन्म ०३ जनवरी १८३१ नायगाँँव महाराष्ट्र  में हुआ था। वह बचपन से ही बहुत ही बहादुर थी उनका ९ वर्ष की आयु में ज्योतिबा फूले से १८४० में विवाह हो गया। उन्हें शिक्षा, संपत्ति आत्म सम्मान से वंचित किया गया। स्त्रियों की दशा और भी खराब थी धार्मिक पाखंड, अंधविश्वास, रूढि़वाद, अपृश्यता बहु विवाह, बाल विवाह, अनमेल विवाह महिलाओं और शुद्रो के शारीरिक और मानसिक शोषण होता था । सावित्री बाई फूले एवं ज्योतिबा फूले इन सबके खिलाफ काम किया। भारत की प्रथम महिला शिक्षिका बनी। ०१ जनवरी १८४८ में पहला स्कूल भिड़ेवाडा पुणे में शुरू किया। सावित्री बाई के जीवन में अनेक कठिनाई आई लेकिन उन्होंने हार नही मानी और संघर्ष करते हुए महिलाओ को शिक्षित करती रही। पुरूष प्रधान सामाजिक व्यवस्था में सावित्री बाई फूले का महिलाओ को शिक्षित करना आसान नही था। लेकिन कर्मठता और जुनून ने तमाम तकलीफो को झेलते हुए कई स्कूल, हॉस्टल, अस्पताल, अनाथालय खोले ताकि गरीब मजदूर लोग शिक्षित होकर अपने अधिकार की लड़ाई लड़ सके। रोगियो की सेवा करते हुए स्वयं भी प्लेग से संक्रमित हो गयी। १० मार्च १८९७ में उनका निधन हो गया। कार्यक्रम का आभार व्यक्त बुद्धमित्रा वासनिक एवं संचालन सुनिता इलमकर द्वारा किया गया।

कार्यक्रम में महिला सशक्तिकरण सदस्य मुख्य रूप से हर्षिका गजभिए, माया खोब्रागढ़े, मीना खोब्रागढ़े, सविता जामुलकर, आशा जामुलकर, वंदना बोरकर, वैशाली राउत, ऊषा भौतमांगे, ज्योत्सना मेश्राम, रतना मेश्राम, चंद्रशिला बाम्बेश्वर, भीमराव बोरकर, छन्नू मेश्राम, अमर बोरकर, मोहन रामटेके, मुकेश बोरकर, अशोक रामटेके, रमेन्द्र कांडे, राधा कांडे, मधु मेश्राम, सुरेखा डोंगरे, सतरूपा लेंझारे, रमा रामटेके, संध्या उके, आशा बोरकर एवं ग्राम केरेगांव, चिरचारी खुर्द, खुर्सीपार, पदगुड़ा, बागबाहर के ग्रामवासी आदि अधिक संख्या में उपस्थित थे।

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