छत्तीसगढ़ में आयुर्वेदिक ग्राम बनाने की योजना का लाभ किसानों को नहीं मिल पाया। 22 करोड़ रुपए खर्च करने के बाद किसानों के हाथ खाली रह गए। 11 साल पुरानी योजना में 500 से अधिक आयुर्वेदिक ग्राम बनाए गए, लेकिन खेती सिर्फ कागजों पर ही चलती रही। इसके तहत पौधे लगाकर फंड का दुरुपयोग किया गया। किसानों को कोई फायदा नहीं हुआ। अब सरकार ने यह योजना ही बंद कर दी है। योजना किसानों को प्रशिक्षण देने व नर्सरी विकसित करने के लिए बनाई गई थी।
एक भी नर्सरी तैयार नहीं : आयुर्वेद औषधालयों में बनने वाली नर्सरी में यदि औषधीय पौधे तैयार होते तो बांटे जाते किसानों को
केस-1. उजाड़ है औषधालय: तस्वीर दुर्ग के थनौद औषधालय की है। सिर्फ गमले में 3 औषधि के पौधे लगे हैं। सतावरी और दो-तीन एलोवेरा के पौधे हैं। थनौद में किसानों न प्रशिक्षण दिया गया, न पौधे उपलब्ध कराए गए।
केस-2. सेलूद में दिखावे की नर्सरी: गांव सेलूद की नर्सरी में आयुर्वेदिक पौधे तो नही हैं, लेकिन कौहा पेड़, फूल और झाड़ियां जरूर हैं। ग्रामीणों का कहना है कि योजना के बारे में किसानों को जानकारी भी नहीं दी गई है।
25 आयुर्वेदिक ग्राम को दिए एक-एक लाख
अवधारणा इसलिए पूरी नहीं
योजना की अवधारणा आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए बनी। पांच चरणों में योजना पूरी होनी थी। आरोग्य समिति समिति बनी, लेकिन औपचारिक रही। किसानों को जड़ी-बूटी और औषधि पौधे कीं जानकारी देनी थी, औषधालयों में पौधे लगाना था लेकिन 80% औषधालयों में पौधे नहीं हैं। किसानों को औषधि का प्रशिक्षण नहीं दिया गया।
खर्च को इस तरह जानिए
आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए योजना बनाई। 2008-09 में पहली बार 25 आयुर्वेदिक ग्रामों के लिए एक-एक लाख रुपए बजट जारी हुआ। उसके बाद पूरे प्रदेश में 500 आयुर्वेदिक ग्राम बने। प्रत्येक के लिए 40-40 हजार रुपए दिए गए। 2019-20 तक यह योजना चली। इस तरह 11 साल में 22 करोड़ से ज्यादा खर्च किए गए। योजना का कोई लाभ नहीं मिला।

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