छत्तीसगढ़ में आयोजित सुशासन तिहार के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था और अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। प्रदेश के विभिन्न जिलों में आयोजित कार्यक्रमों में मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद और विधायकों ने मंच से अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यशैली पर नाराजगी जाहिर की। कई जगहों पर जनसमस्याओं के निराकरण में लापरवाही सामने आने पर अधिकारियों को सार्वजनिक रूप से फटकार लगाई गई, वहीं कुछ मामलों में निलंबन जैसी कठोर कार्रवाई भी की गई। सुशासन तिहार का उद्देश्य आम जनता की समस्याओं का त्वरित समाधान करना और शासन-प्रशासन को लोगों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाना था, लेकिन कई स्थानों पर लोगों ने शिकायत की कि उनकी समस्याएं लंबे समय से लंबित हैं और संबंधित विभागों द्वारा कोई ठोस पहल नहीं की जा रही है। जनप्रतिनिधियों के दौरे के दौरान जब शिकायतों की हकीकत सामने आई तो अधिकारियों से जवाब-तलब किया गया। कुछ जिलों में मुख्यमंत्री ने स्वयं अधिकारियों को चेतावनी देते हुए कहा कि जनता की समस्याओं के समाधान में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। वहीं कई विधायकों और सांसदों ने भी अधिकारियों को उनकी जिम्मेदारियों का एहसास कराया और कार्यप्रणाली में सुधार लाने के निर्देश दिए। दूसरी ओर कर्मचारियों के एक वर्ग ने इस पूरे आयोजन को लेकर असंतोष व्यक्त किया है। उनका कहना है कि सुशासन तिहार के नाम पर वास्तविक समस्याओं के समाधान से अधिक जोर प्रचार-प्रसार और सोशल मीडिया पर गतिविधियों को दिखाने पर दिया गया। कुछ कर्मचारियों ने इसे “रीलबाजी” करार देते हुए आरोप लगाया कि जमीनी स्तर पर संसाधनों और स्टाफ की कमी के बावजूद उन पर अतिरिक्त दबाव डाला जा रहा है। उनका कहना है कि योजनाओं और कार्यक्रमों की सफलता का आंकलन केवल वीडियो और तस्वीरों के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके लिए वास्तविक कार्य और परिणाम महत्वपूर्ण हैं। कई स्थानों पर बैठकों के दौरान अधिकारियों और कर्मचारियों से तीखे सवाल पूछे गए, जिससे प्रशासनिक महकमे में हलचल बढ़ गई। कुछ मामलों में अधिकारियों को बैठक से बाहर तक कर दिया गया, जबकि कई विभागों को समय-सीमा में लंबित कार्य पूर्ण करने के निर्देश दिए गए। सुशासन तिहार के दौरान हुई इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सख्त रुख अपनाने के मूड में है। हालांकि कर्मचारियों का यह भी कहना है कि बेहतर परिणामों के लिए केवल कार्रवाई ही नहीं, बल्कि आवश्यक संसाधन, पर्याप्त मानवबल और कार्य के अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना भी जरूरी है। कुल मिलाकर सुशासन तिहार ने एक ओर जहां जनता की शिकायतों को सामने लाने का मंच प्रदान किया, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक तंत्र की कमियों और चुनौतियों को भी उजागर कर दिया। अब देखना होगा कि इस अभियान के दौरान मिली शिकायतों और दिए गए निर्देशों का जमीनी स्तर पर कितना प्रभाव पड़ता है और क्या वास्तव में शासन और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो पाता है।
त्वरित ख़बरें : ज़ाफ़रान खान रिपोर्टिंग

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