75 दिनों तक चलने वाले विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की वैसे तो सारी रस्में अपने आप में अनूठी हैं, लेकिन निशा जात्रा रस्म का बड़ा महत्व है। बस्तर दशहरा मनाने से पहले शारदीय नवरात्र की अष्टमी की आधी रात निशा जात्रा विधान पूरा किया गया है। जगदलपुर के निशा जात्रा मंदिर में बस्तर राजा कमलचंद भंजदेव ने मां खमेश्वरी की पूजा कर यह रस्म अदा की। इस विधान को पूरा करने के लिए 12 बकरों की बलि दी गई। यह परंपरा पिछले कई सालों से चली आ रही है। विधान को पूरा करने के बाद राजा ने क्षेत्रवासियों की खुशहाली की कामना की।
राज परिवार के सदस्य महुआ तेल से प्रज्वलित मशाल की रोशनी में निशा जात्रा मंदिर पहुंचे।
दरअसल, निशा जात्रा विधान को पूरा करने के लिए 12 गांव के राउत माता के लिए भोग प्रसाद तैयार किए। राज परिवार के सदस्य महुआ तेल से प्रज्वलित विशेष मशाल की रोशनी में अनुपम चौक स्थित निशा जात्रा मंदिर पहुंचे और लगभग 1 घंटे तक तांत्रिक पूजा की। इस विधान को पूरा करने के लिए 12 बकरों की बलि देकर मिट्टी के 12 पात्रों में रक्त भरकर तांत्रिक पूजा अर्चना करने की परंपरा है।
12 गांव के राउत माता के लिए भोग प्रसाद तैयार किए।
तांत्रिक पूजा होने की वजह से नहीं खाते प्रसाद
निशा जात्रा पूजा के लिए भोग प्रसाद तैयार करने का जिम्मा राजुर, नैनपुर, रायकोट के राउत का होता है। इनके द्वारा तैयार किया गया भोग प्रसाद करीब 200 सालों से माता कामेश्वरी को अर्पित किया जा रहा है। तांत्रिक पूजा होने के कारण यहां का प्रसाद कोई व्यक्ति ग्रहण नहीं करता। इसलिए हांडियों में लाए गए प्रसाद को दूसरे दिन गाय को खिला दिया जाता है।
तांत्रिक पूजा होने के कारण यहां का प्रसाद कोई व्यक्ति ग्रहण नहीं करता।
यह भी जानिए
जानकार बताते हैं कि, इस तांत्रिक रस्म को राजा महाराजा बुरी प्रेत आत्माओं से राज्य कि रक्षा के लिए अदा करते थे। इस रस्म में बलि देकर देवी को प्रसन्न किया जाता है। मान्यता है कि, देवी राज्य कि रक्षा बुरी प्रेत आत्माओं से कर सके। निशा जात्रा कि यह रस्म बस्तर के इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान रखती है। हालांकि समय के साथ इस रस्म में बदलाव आया है। पहले इस रस्म में हजारों भैंसों सहित नर बलि देने की परंपरा थी। लेकिन अब केवल 12 बकरों की बलि दी जाती है।