पलायन रोकने नहीं हुई विशेष पहल:फिर भी बांडेड लेबर एक्ट 1976 की अनेदखी, यही वजह है कि बंधुआ मजदूर मामले में दर्ज नहीं होती रिपोर्ट

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बंधुआ मजदूर की कुप्रथा से निबटने के लिए केंद्र सरकार ने बांडेड लेबर एक्ट 1976 बनाया है। इस कानून के मुताबिक किसी भी व्यक्ति को बंधक बनाकर उससे जबरन काम कराए जाने को गैर कानूनी घोषित किया गया है। ऐसा करते हुए पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति को 3 साल कैद और अर्थदंड की सजा न्यायालय द्वारा दी जा सकती है पर इस कानून का सही ढंग से प्रचार-प्रसार नहीं किया गया है। इससे स्पष्ट है कि अब तक जिले में पलायन रोकने कोई ठोस पहल नहीं हुई है।

श्रम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक जिला बनने से लेकर अब तक सिर्फ 12 बंधुआ मजदूरों के प्रकरण ही दर्ज किए गए हैं। जिला श्रम पदाधिकारी आजाद सिंह पात्रे ने बताया कि बंधुआ मजदूरों का सबसे बड़ा प्रकरण जिले में 2018 में आया था। इस साल प्रशासन ने रोजगार की तलाश में रोजगार की तलाश में केरल गए, जिले के 11 मजदूरों को एक फैक्ट्री में बंधक बना लिया गया था।

मजदूरों के दस्तावेजों को लेकर संचालक ने इनको बंधक बना लिया था। परिजन की शिकायत पर प्रशासन ने इन्हें रिहा कराया था, वहीं अप्रैल 2019 में एक मजदूर को स्वयंसेवी संगठन ने बंगलुरू से रिहाकर जिला प्रशासन को सौंप दिया था। बंधुआ मजदूरों के इन दो प्रकरणों के अतिरिक्त जिले में अब तक सरकारी रिकार्ड में मजदूरों का कोई प्रकरण दर्ज नहीं है।

जिला श्रम पदाधिकारी आजाद सिंह पात्रे ने बताया कि बंधुआ मजदूरी के पीड़ित को केंद्र सरकार की ओर से 1 लाख रुपए मुआवजा दिए जाने का प्रावधान है। हालांकि जिले के 12 मजदूरों को अब तक इसका भुगतान नहीं किया जा सका है। मुआवजा प्रकरण बनाकर शासन को भेज दिया गया है, लेकिन अब तक राशि प्राप्त नहीं हो सकी है।

तमिलनाडु और पुणे में जिले के मजदूर बंधक
हाल ही में खाद्य व श्रम मंत्री अमरजीत भगत को तमिलनाडु में 250 मजदूरों के बंधन बनाए जाने की सूचना मिली थी। जिसपर श्रम विभाग मजदूरों की वापसी की कार्रवाई करा रहा है। इस कार्रवाई में जशपुर जिले के करीब 16 मजदूरों की वापसी हुई है। वहीं पुणे में 13 मजदूर बंधक हैं। परिवार वालों ने कोतबा चौकी पहुंचकर मदद की गुहार लगाई है। श्रम विभाग ने पुणे के प्रशासन से संपर्क किया है। इधर तमिलनाडु से भूखे-प्यासे पैदल गांव वापस आ रहे मजदूर की रास्ते में मौत भी हुई है।