माई जी को बस्तर दशहरा का निमंत्रण.....!

त्वरित ख़बरें - देवी दंतेश्वरी को सुमिरन किये बिना बस्तर में आज भी कोई शुुभ कार्य संपन्न नहीं किया जाता है। दशहरा में देवी मावली की पालकी जगदलपुर जाती है।

माई जी को बस्तर दशहरा का निमंत्रण.....!

अमित पांडेय ब्यूरो प्रमुख राजनांदगाँव / भारतीय परंपरा में किसी भी शुभ कार्य के लिये सबसे पहले देवी देवताओं को याद किया जाता है। उनकी पूजा अर्चना के बाद ही मांगलिक कार्य संपन्न किये जाते है। कुछ रस्मों रिवाजों एवं कार्यक्रमों देवी देवताओं की उपस्थिति बेहद ही अनिवार्य होती है। 

बस्तर दशहरा में भी देवी दंतेश्वरी की उपस्थिति अनिवार्य होती है। बस्तर में देवी दंतेश्वरी के बिना दशहरा पर्व संभव ही नहीं है। देवी दंतेश्वरी दसवी सदी पूर्व से वर्तमान काल तक बस्तर की आराध्या देवी है। पूर्व में नागवंशी राजाओं एवं परवर्ती काकतीय चालुक्य राजाओं ने देवी को अपनी ईष्ट देवी मानकर आराधना की। 

नागयुगीन माणिक्यदेवी ही चालुक्य काकतीय राज में दंतेश्वरी के नाम से जानी गई। नागराजाओं ने माणिक्यदेवी के सम्मान में हर तरह के आयोजन किये उसी प्रकार काकतीय चालुक्य राजाओं में अन्नमदेव और बाद पुरूषोत्तम देव ने देवी की उपस्थिति में दशहरे का प्रारंभ किया। 

देवी दंतेश्वरी को सुमिरन किये बिना बस्तर में आज भी कोई शुुभ कार्य संपन्न नहीं किया जाता है। दशहरा में देवी मावली की पालकी जगदलपुर जाती है। देवी के छत्र को राजा या पुजारी अपने हाथों में लेकर रथारूढ़ होते है। देवी के छत्र को रथ पर विराजित कर रथ परिक्रमा की परंपरा निर्वहन की जाती है। 

आश्विन शुक्ल पंचमी को राज परिवार के सदस्य, मांझी चालकियों का दल जगदलपुर से दंतेवाड़ा में माई जी के मंदिर में दशहरा निमंत्रण देने के लिये आते है। निमंत्रण के लिये विनय पत्रिका राजगुरू द्वारा संस्कृत में लिखी जाती है। विनय पत्रिका  , अक्षत सुपारी सहित बस्तर महाराजा के द्वारा देवी दंतेश्वरी के चरणो में अर्पित की जाती है। 

देवी से दशहरा में सम्मिलित होने की गुहार लगाई जाती है। न्यौते को स्वीकार करने के बाद देवी के प्रतीक मावली माता एवं दंतेश्वरी मां की प्रतिमा जो नये कपड़े में हल्दी का लेप लगाकर बनायी जाती है।  देवी की पूजा अर्चना कर पालकी में विराजित किया जाता है। 

पालकी को गर्भगृह से बाहर मंदिर के सभाकक्ष में रखा जाता है। पंचमी से अष्टमी तक देवी की डोली सभाकक्ष में स्थापित रहती है। अष्टमी को देवी दंतेश्वरी की पालकी पुजारी एवं सेवादार के साथ जगदलपुर रवाना होती है।