लोअर कोर्ट का आदेश अवैध: हाईकोर्ट ने 20 साल पुराने दुष्कर्म केस में आरोपी को दी राहत

त्वरित खबरें - दामिनी साहू रिपोर्टिंग

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट:- ने लिया बड़ा फैसला 

छत्तीसगढ़:- में एक महत्वपूर्ण मामले में  ने बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि हर मामले में शादी का वादा करके बनाए गए शारीरिक संबंध को दुष्कर्म (रेप) नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब संबंध वयस्कों के बीच सहमति से बने हों। अदालत ने लगभग 20 साल पुराने मामले में आरोपी को दोषमुक्त करते हुए निचली अदालत के फैसले को अवैध बताया। 

यह फैसला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि अदालत ने साफ किया कि सहमति से बने रिश्ते और झूठे वादे के आधार पर बने संबंध में कानूनी अंतर होता है, और हर मामले को परिस्थितियों के आधार पर जांचना जरूरी है।

यह मामला छत्तीसगढ़ के सरगुजा क्षेत्र से जुड़ा बताया जाता है। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि जब वह 12वीं कक्षा में पढ़ रही थी, तब आरोपी से उसकी पहचान हुई। धीरे-धीरे दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और आरोपी ने उससे शादी करने का वादा किया।

पीड़िता के अनुसार आरोपी ने 8 सितंबर 2000 से लेकर 14 अप्रैल 2004 तक कई बार शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। बाद में जब शादी नहीं हुई तो युवती ने आरोपी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

जांच के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर अदालत में आरोप पत्र पेश किया। ट्रायल के बाद निचली अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (दुष्कर्म) के तहत दोषी मानते हुए 7 साल की सजा और 5 हजार रुपये जुर्माना लगाया था। 

निचली अदालत के फैसले के खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की। उसका कहना था कि यह संबंध दोनों की सहमति से बने थे और उसने कभी धोखे से संबंध नहीं बनाए।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले से जुड़े दस्तावेज, गवाहों के बयान और परिस्थितियों का विस्तृत परीक्षण किया। इसके बाद अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि आरोपी का शुरू से ही शादी करने का कोई इरादा नहीं था और उसने केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए झूठा वादा किया था। 

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं—

1. पीड़िता घटना के समय वयस्क थी और उसे अपने फैसलों के परिणाम का ज्ञान था।

2. दोनों के बीच संबंध लंबे समय तक चले, जिससे यह संकेत मिलता है कि यह संबंध सहमति से था।

3. अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी ने शुरू से ही धोखा देने के इरादे से शादी का वादा किया था।

इन आधारों पर अदालत ने कहा कि केवल शादी का वादा पूरा न होना, अपने-आप में दुष्कर्म का अपराध नहीं बनता। इसलिए निचली अदालत का फैसला गलत है और इसे रद्द किया जाता है। 

सहमति और धोखे के बीच अंतर:-

कानून के अनुसार दुष्कर्म के मामलों में यह देखना जरूरी होता है कि सहमति वास्तव में स्वतंत्र थी या किसी धोखे या दबाव के कारण दी गई थी।

कई मामलों में अदालतों ने कहा है कि यदि शुरुआत से ही आरोपी का इरादा शादी करने का नहीं था और उसने केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए झूठा वादा किया, तो यह अपराध माना जा सकता है।

लेकिन यदि दो वयस्कों के बीच प्रेम संबंध थे और बाद में किसी कारण से शादी नहीं हो पाई, तो इसे सीधे-सीधे दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता। 

देश की अन्य अदालतों के फैसले:-

देश की अलग-अलग अदालतों ने भी कई बार इसी तरह के सिद्धांत दोहराए हैं।

कुछ मामलों में अदालतों ने कहा कि लंबे समय तक सहमति से चले रिश्ते को बाद में दुष्कर्म का मामला नहीं बनाया जा सकता। 

अदालतों ने यह भी कहा कि हर टूटे हुए प्रेम संबंध को आपराधिक मामला बना देना न्याय व्यवस्था का दुरुपयोग हो सकता है।

इसलिए न्यायालय यह जांचते हैं कि

क्या आरोपी का शुरुआत से ही धोखा देने का इरादा था,

क्या संबंध सहमति से बने थे,

और क्या पीड़िता को परिस्थितियों का पूरा ज्ञान था।

कानून में क्या प्रावधान है:-

भारतीय कानून में दुष्कर्म को लेकर स्पष्ट प्रावधान हैं। यदि किसी महिला की सहमति डर, दबाव या धोखे के कारण ली जाती है, तो वह सहमति वैध नहीं मानी जाती।

हाल के कानूनी प्रावधानों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि शादी का झूठा वादा करके संबंध बनाए जाते हैं और शुरुआत से ही धोखा देने का इरादा होता है, तो इसे अपराध माना जा सकता है। 

लेकिन हर मामले में अदालत यह देखती है कि

क्या वादा वास्तव में झूठा था

या बाद में परिस्थितियों के कारण शादी नहीं हो पाई।

इस मामले में खास बात यह है कि घटना करीब दो दशक पुरानी थी। लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया चलने के बाद आखिरकार हाईकोर्ट ने आरोपी को राहत दी।

अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया और बिना पर्याप्त प्रमाण के आरोपी को दोषी ठहरा दिया। इसलिए निचली अदालत का आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है और इसे निरस्त किया जाता है।


फैसले का महत्व:-

यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह सहमति आधारित संबंध और दुष्कर्म के आरोप के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट करता है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे मामलों में अदालतें निम्न बातों पर विशेष ध्यान देती हैं—

संबंध की अवधि

दोनों पक्षों की उम्र

व्यवहार और परिस्थितियां

और यह कि वादा सच में धोखा था या नहीं।

इस तरह के फैसले न्यायपालिका की उस सोच को भी दिखाते हैं जिसमें हर मामले को उसके तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर परखा जाता है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट किया कि शादी का वादा कर बनाए गए संबंध हर स्थिति में दुष्कर्म नहीं माने जा सकते। यदि संबंध वयस्कों के बीच सहमति से बने हों और शुरुआत में धोखा देने का स्पष्ट इरादा साबित न हो, तो केवल शादी न होने के आधार पर दुष्कर्म का मामला नहीं बनता