वो मिठाई, जिसने हलवाई का सरनेम बदल दिया:राजा-महाराजा से लेकर कई PM-CM चख चुके स्वाद, आज बना करोड़ों का कारोबार
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जब भी देवनगरी दौसा का जिक्र होता है तो 'डोवठा' की चर्चा जरूर होती है। करीब 155 साल पुराना यह जायका लोगों के साथ-साथ राजनेताओं व राजा-महाराजाओं की पहली पसंद रहा है। बात चाहे 1936 की महाराजा मानसिंह द्वारा गोलछा फैक्ट्री के उद्घाटन के दौरान की हो या फिर आजादी के जश्न कीImage

खुशी के हर मौके पर दौसा का डोवठा ने अपनी मिठास घोली है। इसका स्वाद ऐसा है, जो लोगों की जुबां से लंबे वक्त तक उतरता नहीं। अपनी अनोखी खस्ता मिठाई के रूप में प्रसिद्ध डोवठा मिठाई आज दौसा की पहचान बन चुकी है। ...तो आइये चलें- दौसा की उन गलियों में, जहां तैयार होता दो तरह का डोवठा।

राजा-महाराजाओं के जमाने से स्वाद का बेताज बादशाह डोवठा दौसा में राजनेताओं से लेकर आम लोगों में आज भी पहली पसंद बना हुआ है। इसका नाम डोवठा कैसे पड़ा? यह कहानी भी इसके स्वाद जैसी ही अनूठी है। रियासतकालीन समय से कहावत चली आ रही है कि दौसा के हलवाई ने जब पहली बार डोवठा बनाया तो उसे चखने वाले व्यक्ति का एक से मन नहीं भरा। उसने खाने के लिए दूसरा और उठा लिया। तभी से संभवत: दो-उठा से इसे डोवठा नाम मिला। है न दिलचस्प।

कूलवाल परिवार बना डोवठावाला
सबसे पहले कन्हैयालाल कूलवाल ने दौसा में इस मिठाई को बनाना शुरू किया था। उनके बाद औंकार, रामस्वरूप और अब हरिमोहन कूलवाल डोवठा की पहचान बरकरार रखने के लिए काम कर रहे हैं। कई पीढ़ियों से डोवठा बनाने वाले इस परिवार को अब डोवठावाला परिवार के नाम से जाना जाता है।

कन्हैयालाल के पड़पोते सत्येंद्र डोवठावाला बताते हैं, कूलवाल परिवार की चौथी पीढ़ी भी डोवठा बनाने का काम कर रही है। शुरूआती दौर में नमकीन व मीठा दो फ्लेवर में इसे बनाया जाता था। लेकिन अब केवल मीठे का ही चलन है।

कैसे बनता है डोवठा?Image
सबसे पहले बादाम का पेस्ट तैयार कर देशी घी में फ्राई किया जाता है। इसके बाद मैदा में घी व बादाम का पेस्ट मिलाकर सॉफ्ट गूंथकर लोई बनाई जाती है। जिसे कोटा कचौरी की साइज में बनाकर पकाने के लिए देशी घी में करीब 3 घंटे तक धीमी आंच पर सेंका जाता है।

सिकाई तक इसे फीका ही रखा जाता है। ठंडा होने पर फीके डोवठा को गर्म चाशनी में डुबोया जाता है, इसके बाद डोवठा पूरी तरह तैयार हो जाता है। देशी घी में बनने वाली मिठाई डोवठा बेहद खस्ता व सॉफ्ट होती है, जिसे बच्चे-बुजुर्ग हर कोई शख्स आसानी से खा सकता है।

राजा मानसिंह ने इनाम में दिया कलदार
सत्येंद्र बताते हैं कि करीब 155 साल पहले उनके परिवार ने स्वादिष्ट एवं खस्ता मिठाई के रूप में डोवठा बनाना शुरू किया था। साल 1936 में जयपुर के महाराजा मानसिंह गोलछा फैक्ट्री का उद्घाटन करने दौसा आए थे। तब दौसा के लोगों ने पहचान स्वरूप उनके सामने डोवठा पेश किया, जिसे उन्होंने न केवल पसंद किया बल्कि उसकी प्रशंसा करते हुए कन्हैयालाल हलवाई को इनाम स्वरूप कलदार सिक्का भी दिया।

उन्होंने बताया कि आजादी से पहले दौसा के तत्कालीन नाजिम वीर बहादुर सिंह की बेटी की शादी में कई व्यंजन बनाए गए। आमेर की गूंजी, सांगानेर की दाल, चाकसू की लेसमी, जयपुर का कलाकंद बनाए गए, वहीं विशेष रूप से दौसा का डोवठा भी मेहमानों को परोसा गया। जिस दिन भारत की आजादी की घोषणा हुई तो आजादी के जश्न के दिन शहर के गांधी चौक में मौजूद हर किसी के हाथ में एक तिरंगा था तो दूसरे हाथ में डोवठा।

आडवाणी व शेखावत को भी खूब भाया
डोवठा आम लोगों के साथ वीआईपी लोगों का भी पसंदीदा व्यंजन रहा। स्वतंत्रता सेनानी स्व. रामकरण जोशी, पूर्व राज्यपाल स्व. पंडित नवल किशोर शर्मा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व. राजेश पायलट जैसे बड़े नेताओं को भी यह मिठाई बेहद पसंद थी। इन नेताओं का जब भी दिल्ली या कहीं और दौरा होता तो हमेशा डोवठा साथ लेकर जाते थे।

उनके शब्दों में वे इसे शगुन के रूप में साथ रखते थे और शगुन ही मानते थे। इनके साथ ही भारत उदय यात्रा पर दौसा आए पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत, वसुंधरा राजे समेत कई बड़े नेता डोवठा के स्वाद के शौकीन रहे हैं।

दौसा में 10 दुकानें, करोड़ों का कारोबार
कन्हैयालाल कूलवाल से दौसा के कई कारीगरों ने डोवठा बनाने का तरीका सीखा। इसका स्वाद लोगों की जुबान पर ऐसा चढ़ा कि आज शहर में 10 से ज्यादा दुकानों पर डोवठा बिकता है। इनमें 3 बड़ी दुकानें हैं, जबकि 7-8 छोटी दुकानें हैं, जिनकी डेली सेल 50 किलो के करीब है।

फेस्टिवल सीजन में सेल 10 गुना बढ़ जाती है। एक किलो डोवठा का भाव 420 रुपए है। एक अनुमान के मुताबिक डोवठा का सालाना बिजनेस करीब 2 करोड़ का है। करीब 100 लोगों को इससे रोजगार मिल रहा है।

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