विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस विशेष
नारायणपुर 9 सितम्बर। केस 1- 32 वर्षीय सोनम (परिवर्तित नाम), जिसे परिवार की समझाइश से स्पर्श क्लीनिक नारायणपुर में लाया गया था। शुरुआत में वह उदास और कम बात करने वाली महिला लग रही थी। मनोचिकित्सक द्वारा काउंसलिंग के दौरान सबसे पहले उसे सहज महसूस कराया गया, उसे विश्वास दिलाया गया कि काउंसलिंग में जो भी बातचीत होगी वह गोपनीय रखी जाएगी। सोनम जब पूरी तरह से आश्वस्त हुई तब उसने बताया, “वह पारिवारिक समस्या के कारण कुछ दिनों से नकारात्मक महसूस कर रही है, हमेशा निराश रहना उसके दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। किसी भी सदस्य से वार्तालाप करने का मन नहीं करता। अचानक से गुस्से में आक्रामक व्यवहार करने लग जाती हूं। किसी भी काम में रुचि नहीं लग रहा, नींद भी ठीक से नहीं आ रही है। इस कारण मन मे कई बार मरने के विचार भी आने लगे है।“
केस 2- 24 वर्षीय स्वाति (परिवर्तित नाम) कुछ महीनों से ज्यादा चिड़चिड़ापन, गुस्सा, भाई के साथ बार- बार बहस हो जाना, घरवाले अगर ज्यादा ऊंची आवाज में बात करें तो बहुत ज्यादा आक्रामक व्यवहार करना, पूरी तरह से निराशावादी हो जाना, अकेलापन महसूस करना गुस्सा आने पर मरने की बात कहना स्वाति की आदत बन चुकी थी। परामर्श के दौरान परिवार से ऐसी जानकारी मिली कि स्वाति ने एक बार गुस्से में आकर हानिकारक गोली खा ली थी।
उपरोक्त के सम्बन्ध में जिला अस्पताल नारायणपुर की क्लीनिकल साइकोलोजिस्ट प्रीति चांडक ने बताया, “इस तरह की समस्या दिखने में तो आम लगती है लेकिन इसके परिणाम बहुत ही घातक होते हैं। आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण अवसाद (डिप्रेशन) है। कई बार पारिवारिक कारणों के चलते कुछ लोग ऐसे गलत कदम उठा लेते हैं। आजकल किशोरों में आत्महत्या के बढ़ते कारण के रूप में नशीले पदार्थों का अत्यधिक उपयोग भी शामिल है। कई बार जब व्यक्ति को उसके इच्छा के अनुरूप चीजें नही मिलती, तब वह डिप्रेशन का शिकार हो जाता है। अगर सही समय पर इसका इलाज ना हुआ तो यह डिप्रेशन इतना बढ़ जाता है कि इसका परिणाम आत्महत्या भी हो सकता है। आत्महत्या का विचार रखने वाला व्यक्ति अपनी मनः स्थिति समझने में असमर्थ हो जाता है। ऐसे में जरूरी है कि परिवार के करीबी सदस्य व घनिष्ठ मित्र उनका ख्याल रखें और उन्हें नजदीकी मनोचिकित्सक या मनोवैज्ञानिक की सलाह के लिये ले जाएं। प्रीति चांडक ने बताया, सोनम और स्वाति का केस कुछ मामलों में एक दूसरे से अलग है। जब उन्हें परामर्श के लिये स्पर्श क्लीनिक लाया गया तब उनकी मानसिक स्थिति असामान्य थी। इसलिये सबसे पहले उन्हें साइको एजुकेट किया गया। जब मरीज को कुछ परेशानी होती है, उसे यह समझ नहीं आता कि किस व्यक्ति से वह अपने मन की बात कहें, तब उन्हें कुछ हद तक खुद की सहायता करके, कुछ मनोविशेषज्ञ की सलाह से और परिवार वालों के सहयोग से इस समस्या से निकाला जाता है। इस प्रक्रिया के बाद पेशेंट को मोटिवेशनल थेरेपी के माध्यम समझाया गया कि प्रत्येक समस्या के समाधान के कुछ विकल्प होते हैं इसके लिए आत्महत्या जैसा गलत कदम उठा लेना कोई हल नही है। मरीज को खुद की जिंदगी की महत्ता के बारे में समझाया गया। इसके बाद कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी के द्वारा मरीज की सोच को परिवर्तित करने की कोशिश की गई। उन्हें मेडिटेशन, खुद के अंदर रचनात्मक सृजन, संतुलित आहार/ पर्याप्त नींद, और दिनचर्या की स्व-आंकलन चार्ट बनाने को कहा गया। पूरी प्रक्रिया में पेशेंट को 3 बार या इससे अधिक बार क्लीनिक बुलाया गया जब उनके व्यवहार में सुधार हुआ तो टेलीफोनिक माध्यम से समय - समय पर जानकारी ली गयी। प्रीति चांडक ने बताया, क्लीनिक में आने वाले हर पेशेंट को यह सलाह दी जाती है की जब कभी मन परेशान हो या कुछ समझ में ना आए तब अपनी बातों को अपने विश्वसनीय व्यक्ति से साझा करें, इससे आप हल्का महसूस करेंगे। इसके अलावा समय-समय पर फॉलोअप लेने के लिए टेलिफोनिक काउंसलिंग भी की गयी। इस प्रकार पहले की अपेक्षा सोनम और स्वाति के मन में जीने की चाह उत्पन्न हुई।“

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