5 सितंबर 2022
राजनांदगांव की विसर्जन झांकियां पूरे देश में प्रसिद्ध है। हॉकी और झांकी के नाम से इस शहर को जाना जाता है। हम झांकियों के इतिहास के साथ ही यह भी बता रहे कि किस तरह शुरुआती दौर में खास दोस्तों के बीच तालमेल रहता था। गंभीर बात तो यह है कि दोस्ती कितनी भी प्रगाढ़ रहे लेकिन समिति के सदस्य झांकियों का प्रसंग अपने जिगरी दोस्तों से भी शेयर नहीं करते थे। झांकियों के निर्माण से जुड़े कुछ पुराने सदस्य हमें इन्हीं दास्तां को बता रहे। जो झांकियां उस दौर में पांच से सात हजार रुपए में निर्मित होती थी, उसका बजट अब बढ़कर चार लाख रुपए तक पहुंच गया है।
शहर के वरिष्ठ नागरिक मोहन अग्रहरि शहर के झांकी की परंपरा के बारे में बताते हैं कि हमारे शहर में झांकी प्रसिद्ध है। यहां पुरानी समिति बाल समाज, लघु मंडल, नवरत्न मंडल, नवयुवक मंडल, सुमति मंडल सहित अन्य समितियां द्वारा झांकी निकाली जाती थी।
डेढ़ माह तक रात भर काम
शहर की झांकियां इतनी प्रसिद्ध थी कि यह निर्माण करते-करते ही लगभग समितियों की झांकियां रायपुर की समिति वाले खरीदी कर लेते थे। एक-डेढ़ माह तक रात-रात भर कार्य करते थे और जब झांकी निकालते ही झांकी खरीद ली जाती थी। यहां झांकी निकलने के बाद बाद दूसरे रायपुर में झांकी निकाली जाती है। अब तो काफी परिवर्तन आ गया है। दो-दो जीप में झांकी निकाली जाती है।
रायपुर से लाते थे सामान
शहर में झांकी से संबंधित सामान मिल जाते थे। कभी-कभी रायपुर जाकर दूसरी दिन सामान उपलब्ध करा देते थे। एक प्रसंग था श्रीराम द्वारा यज्ञ के लिए छोड़ गए घोड़े को लव-कुश ने पकड़ा था, उस प्रसंग पर झांकी में घोड़ा बनाना था, घोड़ा पूरा सामान मिल गया लेकिर सफेद फोम यहां नहीं मिला तो तत्काल रायपुर भेजा गया वहां भी काफी मुश्किल से और एक रात में घोड़ा तैयार किया गया।
मूवमेंट वाली झांकी देख तालियां बजाकर किया स्वागत
झांकी निर्माण से जुड़े रामकिशोर मिश्रा बताते हैं कि शुरुआत में यहां आकर्षक लाइट, बैंड बाजा, भजन कीर्तन के साथ बिना मूवमेंट की आकर्षक मूर्तियों के साथ निकाली जाती थी। 1979 में पहली बार मूवमेंट वाली झांकी निकाली गई जो लोगों को काफी पंसद आई। 84 वर्षीय राम किशोर मिश्रा बताते हैं कि 1968 में बीएनसी मिल में नौकरी लगी तो वे पहली बार राजनांदगांव आए। मिल में आर्टिस्ट के पद पर कार्यरत था। 1970 में गणेश उत्सव समिति के संपर्क आया, पहली बार 70 में नवयुवक मंडल की बिना मूवमेंट झांकी निकाली गई। ऐसा सिलसिला चलता रहा।
हुआ था हादसा: मशीन में हाथ फंसने से उंगलियां कट गईं
मिश्रा बताते हैं कि 1978 में कार्य के दौरान मशीन में हाथ फंसने से उनकी उंगलियां कट गई। फिर भी वे गणेश उत्सव समिति से जुड़े रहे। 1978 में झांकी बनाई लेकिन हाथ में तकलीफ होने के कारण निर्माण देरी हो गई और उस वर्ष हमारी समिति से झांकी निकालने में देरी हो गई। 1979 में दोगुने उत्साह से साथियों के साथ कार्य करते हुए पहली बार शहर में मूवमेंट वाली विश्वामित्र और मेनिका पर आधारित झांकी निकाले जिसे लोगों ने खूब सहारा। इसके बाद उन्होंने नवयुवक मंडल, लघु मंडल, सुमति मंडल, नवरत्न मंडल, बाल समाज जैसे सभी समितियों में भी झांकी निर्माण किया।
चाहते थे कि शहर में हमारी झांकी सबसे पहले निकले
बकौल अग्रहरि समिति के सदस्य मानते थे कि हमारी झांकी सबसे पहले निकले, ये उत्साह रहता था। एक रोमांच जैसा महसूस होता था। जैसे ही गणेश उत्सव समाप्त हो जाता दोस्ती फिर वैसे ही हो जाती थी जैसे पहले हुआ करती थी। ऐसी परंपरा रही है हमारी।

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