मां बम्लेश्वरी धाम एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है। कथित मुर्गे की बलि और बैगा पद्धति से पूजा-अर्चना के मामले ने डोंगरगढ़ में वर्षों से चल रहे मंदिर ट्रस्ट और आदिवासी गोंड समाज के विवाद को फिर से हवा दे दी है। इस पूरे मामले में राज बैगा किशोर नेताम की गिरफ्तारी के बाद क्षेत्र का माहौल गरमा गया है और आदिवासी समाज खुलकर विरोध में उतर आया है। मामला केवल एक धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि अब यह परंपरा, आस्था, अधिकार और धार्मिक व्यवस्था के टकराव का रूप ले चुका है।
जानकारी के अनुसार मां बम्लेश्वरी के ऊपरी मंदिर परिसर में पुराने रोपवे के पास स्थित एक चट्टान को “गढ़ माता” मानकर बैगा पद्धति से पूजा की गई थी। इसी दौरान कथित रूप से मुर्गे की बलि देने का आरोप लगाया गया। घटना के बाद बम्लेश्वरी मंदिर ट्रस्ट समिति के अध्यक्ष मनोज अग्रवाल ने डोंगरगढ़ थाने में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में कहा गया कि इस घटना से मंदिर की धार्मिक मर्यादा और पवित्रता भंग हुई है तथा करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत हुई हैं। ट्रस्ट का स्पष्ट कहना है कि मंदिर परिसर में केवल सनातन वैदिक परंपरा के अनुसार ही पूजा-अर्चना की अनुमति है और किसी भी प्रकार की बलि प्रथा स्वीकार्य नहीं है। मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर आरोपी किशोर नेताम को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि पूरे मामले की जांच जारी है।
हालांकि गिरफ्तारी के बाद आदिवासी और गोंड समाज में भारी नाराजगी देखने को मिल रही है। समाज के लोगों का कहना है कि मां बम्लेश्वरी धाम से उनकी आस्था और बैगा परंपरा का संबंध सदियों पुराना है। उनका दावा है कि पहाड़ी और शक्तिपीठों में लोक परंपरा के अनुसार पूजा-अर्चना होती रही है और अब उसी पारंपरिक व्यवस्था को अपराध बताकर कार्रवाई की जा रही है। आदिवासी समाज का आरोप है कि उनकी धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक पहचान को लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। समाज के कई संगठनों ने इसे आदिवासी परंपराओं के दमन के रूप में देखा है।
दरअसल डोंगरगढ़ में मंदिर ट्रस्ट और आदिवासी समाज के बीच विवाद कोई नया नहीं है। पिछले कई वर्षों से ट्रस्ट में प्रतिनिधित्व, पूजा अधिकार और पारंपरिक व्यवस्थाओं को लेकर लगातार खींचतान चल रही है। आदिवासी समाज कई बार यह मांग उठा चुका है कि मंदिर ट्रस्ट में गोंड समाज को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए और बैगा परंपरा को सम्मान मिले। नवरात्रि के दौरान गर्भगृह प्रवेश और पंचमी भेंट को लेकर भी पहले कई बार विवाद हो चुके हैं। उस समय भी आदिवासी संगठनों और मंदिर ट्रस्ट के बीच तीखी बयानबाजी देखने को मिली थी। कई बार आंदोलन और बंद की चेतावनी भी दी गई थी।
स्थानीय स्तर पर लंबे समय से यह बहस जारी है कि मां बम्लेश्वरी धाम की मूल परंपरा क्या रही है और मंदिर की व्यवस्था में किन समुदायों की ऐतिहासिक भूमिका रही है। खैरागढ़ राजपरिवार का नाम भी समय-समय पर इस विवाद में जुड़ता रहा है। आदिवासी समाज का आरोप है कि मंदिर की मूल लोक परंपराओं को धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है, जबकि ट्रस्ट हमेशा धार्मिक मर्यादा और वैदिक व्यवस्था बनाए रखने की बात करता रहा है।
अब किशोर नेताम की गिरफ्तारी ने इस पुराने विवाद को फिर विस्फोटक बना दिया है। सूत्रों के अनुसार आदिवासी समाज में भारी आक्रोश है और यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो बड़ा आंदोलन खड़ा हो सकता है। डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर शुरू हुआ यह विवाद अब केवल एक पुलिस केस नहीं रह गया, बल्कि यह आस्था, परंपरा, अधिकार और धार्मिक नियंत्रण की ऐसी लड़ाई बन चुका है जिसकी गूंज आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है।

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