चुनावी माहौल में वित्त मंत्री ने देश की जनता को समझाए जीएसटी के फायदे, ट्वीट कर साझा किया अपना लेख
त्वरित ख़बरें - दीपमाला शेट्टी रिपोर्टिंग

नई दिल्‍ली. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इन दिनों देश भर के प्रबुद्ध वर्गों के बीच मोदी सरकार के काम काज के फायदे गिनाने में खासी व्यस्त हैं. वित्त मंत्रालय की कमान संभालने के बाद निर्मला सीतारमण ने जीएसटी को अमली जामा पहनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. अब चुनावी माहौल गरमा चुका है, तब वित्त मंत्री ने एक लंबा लेख लिखकर जीएसटी के इतिहास से लेकर संघिय ठांचे को दुरुस्त करने में इसकी भूमिका को लेकर भी खूब दलीलें दी हैं. निर्मला सीतारमण ने ये बताया है कि जीएसटी, ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास’ के प्रति मोदी सरकार की प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति है. उनका कहना है कि हम निरंतर यह सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयासरत हैं कि करों को बढ़ाने के बजाय, बेहतर करदाता सेवाओं और कार्यकुशलता में वृद्धि के माध्यम से नई ऊंचाइयों को छुआ जाए.

निर्मला सीतारणण के लेख में लिखा है कि जीएसटी संरचना के अंतर्गत दो महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की गई हैं. जीएसटी अपीलीय न्यायाधिकरण (जीएसटीएटी) के अध्यक्ष की नियुक्ति हुई है और आर्थिक गतिविधि में वृद्धि का नतीजा ये निकला है कि सकल जीएसटी संग्रह 2 लाख करोड़ रुपये की सीमा को पार कर गया है. निर्मला सीतारमण ने इस लेख को तीन भागों में विभाजित किया है. पहला भाग जीएसटी की उत्पत्ति और अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को सुव्यवस्थित करने में इसकी भूमिका की पड़ताल करता है. दूसरा भाग इस बात की चर्चा करता है कि कैसे जीएसटी ने गरीब-समर्थक दृष्टिकोण के माध्यम से लोगों को लाभान्वित किया है. तीसरा भाग सहकारी और राजकोषीय संघवाद को बढ़ावा देने में जीएसटी की भूमिका पर प्रकाश डालता है.

शुरुआत वाजपेयी ने की और अमली जामा पीएम मोदी ने पहनाया

लेख के पहले हिस्से में वित्त मंत्री ने बताया है कि सबसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में जीएसटी पर विचार किया गया था. अपने 10 वर्षों के कार्यकाल में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार जीएसटी पर राजनीतिक सहमति प्राप्त करने में असफल रही. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जीएसटी को लाने की आवश्यक सहमति प्राप्त की गई और 2016 में संसद में जीएसटी अधिनियम पारित किए गए. निर्मला सीतारमण के मुताबिक, जीएसटी से पहले भारत की अप्रत्यक्ष कर प्रणाली विभाजित और जटिल थी जिसमें प्रत्येक राज्य विभिन्न नियमों और कर दरों के साथ व्यावहारिक रूप से अपने आप में एक अलग बाजार था. केंद्रीय उत्पाद शुल्क जैसे करों के लिए इनपुट का लाभ नहीं उठाया जा सका जिससे आम लोगों पर टैक्स का बोझ बढ़ गया.

जीएसटी ने 17 करों और 13 उपकरों को 5-स्तरीय संरचना में सुव्यवस्थित किया और कर-शासन को सरल बनाया. पंजीकरण के लिए टर्नओवर सीमा, वस्तु के लिए 40 लाख रुपये और सेवाओं के लिए 20 लाख रुपये (वैट के तहत औसतन 5 लाख रुपये से) हो गई. जीएसटी ने राज्यों के 495 अलग -अलग प्रविष्टियों (चालान, फॉर्म, घोषणा, आदि) की संख्या को घटाकर केवल 12 कर दिया. जीएसटी; एकसमान प्रक्रियाओं, सरल पंजीकरण, एकल रिटर्न और न्यूनतम भौतिक संचालन व पूरी तरह से सूचना प्रौद्योगिकी द्वारा परिचालित प्रणाली के माध्यम से अनुपालन को सरल बनाने में सफल रहा.

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