मां बम्लेश्वरी मंदिर किसका? राजपरिवार, ट्रस्ट या गोंड-आदिवासी समाज का अधिकार; पूजा पद्धति और प्रतिनिधित्व पर छिड़ी बहस

त्वरित खबरें :भूमिका दास

डोंगरगढ़। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ स्थित मां बम्लेश्वरी मंदिर में पूजा पद्धति, पुरानी परंपराओं और मंदिर ट्रस्ट में विभिन्न समाजों की भागीदारी को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा में है। खैरागढ़ राजपरिवार के सदस्य भवानी बहादुर सिंह ने मंदिर ट्रस्ट में सभी समाजों को प्रतिनिधित्व देने की मांग उठाई है। वहीं, ट्रस्ट का कहना है कि मंदिर किसी एक परिवार की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि जनता की आस्था का केंद्र है।

पंचमी भेंट के दौरान गर्भगृह में प्रवेश को लेकर हुआ था विवाद

मां बम्लेश्वरी मंदिर में चैत्र नवरात्रि की पंचमी भेंट के दौरान गोंड समाज के लोग आंगा देव के साथ पारंपरिक पूजा के लिए पहुंचे थे। इस दौरान गर्भगृह में प्रवेश को लेकर विवाद हो गया था। मंदिर ट्रस्ट ने आरोप लगाया था कि निर्धारित नियमों का पालन किए बिना गर्भगृह में प्रवेश किया गया। इसके बाद मंदिर की पूजा पद्धति, पारंपरिक रीति-रिवाजों और राजपरिवार की भूमिका को लेकर बहस तेज हो गई।

भवानी बहादुर सिंह ने उठाई सभी समाजों को प्रतिनिधित्व देने की मांग

खैरागढ़ राजपरिवार के सदस्य भवानी बहादुर सिंह का कहना है कि मंदिर की पुरानी व्यवस्था में राजपरिवार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके अनुसार, मंदिर की देखरेख के लिए ट्रस्ट का गठन किया गया था, लेकिन समय के साथ राजपरिवार की पूजा संबंधी भूमिका सीमित होती चली गई।

भवानी बहादुर सिंह ने मांग की है कि मंदिर ट्रस्ट में आदिवासी समाज सहित सभी समुदायों को उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उन्होंने अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी अलग-अलग समुदायों को बारी-बारी से देने का सुझाव दिया है, ताकि मंदिर की व्यवस्था में सभी समाजों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके।

ट्रस्ट का पक्ष: मंदिर जनता की आस्था का केंद्र

मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष मनोज अग्रवाल के मुताबिक, मंदिर की व्यवस्था पहले खैरागढ़ राजपरिवार के हाथों में थी। बाद में मंदिर के संचालन और व्यवस्थाओं के लिए समिति बनाई गई तथा ट्रस्ट का गठन किया गया।

ट्रस्ट का कहना है कि मंदिर किसी व्यक्ति या परिवार की निजी संपत्ति नहीं है। यहां श्रद्धालुओं की आस्था और मंदिर की निर्धारित व्यवस्थाओं के अनुसार पूजा-अर्चना होती है। ट्रस्ट अध्यक्ष के अनुसार, मंदिर में वैदिक और बैगा पद्धति से पूजा की जाती है। राजपरिवार को दर्शन से रोकने के आरोपों को भी उन्होंने सही नहीं माना।

ट्रस्ट के पुराने नियम और सदस्यता पर भी सवाल

विवाद के बीच ट्रस्ट के पुराने बायलॉज में खैरागढ़ के राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह को आजीवन मानद सदस्य बनाए जाने का प्रावधान भी चर्चा में है। उपलब्ध नियम के अंश के अनुसार, यह सदस्यता राजा तक सीमित थी और वे अपने स्थान पर किसी प्रतिनिधि को नामित नहीं कर सकते थे।

ट्रस्ट अध्यक्ष का कहना है कि यह प्रावधान स्वयं राजा ने बनवाया था। हालांकि, उपलब्ध दस्तावेजों में बायलॉज का केवल एक अंश सामने आने के कारण बाद में नियमों में हुए संभावित बदलावों की पूरी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

पूजा पद्धति और ज्योति कलश की परंपरा पर अलग-अलग दावे

भवानी बहादुर सिंह ने आरोप लगाया है कि समय के साथ राजपरिवार से जुड़ी कुछ पुरानी परंपराओं में बदलाव हुआ है। उनका कहना है कि पहले राजपरिवार के नाम से पहला ज्योति कलश जलाने और पंचमी-अष्टमी की पूजा में परिवार की भूमिका बनाए रखने की बात थी।

दूसरी ओर, ट्रस्ट अध्यक्ष मनोज अग्रवाल का कहना है कि राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह के निधन के बाद उनके नाम से ज्योति जलाने के बजाय मां बम्लेश्वरी के नाम से पहली ज्योति जलाई जाने लगी। दोनों पक्षों के इन दावों के बीच पुरानी परंपराओं और बदलावों से संबंधित दस्तावेज महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

मंदिर ट्रस्ट में सभी समाजों की भागीदारी बनी चर्चा का विषय

भवानी बहादुर सिंह का कहना है कि मां बम्लेश्वरी के दरबार में विभिन्न समाजों के श्रद्धालु पहुंचते हैं, इसलिए मंदिर के प्रबंधन में भी उनकी भागीदारी होनी चाहिए। उन्होंने ट्रस्ट की सदस्यता और मतदान व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं।

इस पूरे विवाद में तीन प्रमुख मुद्दे सामने आए हैं—मंदिर की ऐतिहासिक परंपराएं, पूजा पद्धति को लेकर अलग-अलग पक्षों के दावे और ट्रस्ट में विभिन्न समाजों का प्रतिनिधित्व। इन सवालों पर स्थिति स्पष्ट करने के लिए पुराने दस्तावेजों, ट्रस्ट के नियमों और संबंधित पक्षों के आधिकारिक बयानों का महत्व रहेगा।

मां बम्लेश्वरी मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। ऐसे में मंदिर की परंपराओं और प्रबंधन से जुड़े विवाद का समाधान आपसी संवाद, दस्तावेजों की स्पष्टता और निर्धारित नियमों के अनुरूप होना महत्वपूर्ण है।