डोंगरगांव -अपनी ही सरकार की साख पर उठे सवाल: डोंगरगांव सड़क भ्रष्टाचार पर भाजपाइयों का विरोध या लिफाफे की सियासत?

राहुल ओझा ब्यूरो प्रमुख-राजनांदगांव

अपनी ही सरकार की साख पर उठे सवाल: डोंगरगांव सड़क भ्रष्टाचार पर भाजपाइयों का विरोध या लिफाफे की सियासत?

​राजनांदगांव। (नरेन्द्र डाकलिया)डोंगरगांव नगर में पिछले चार वर्षों से अधूरी पड़ी चार लेन सड़क निर्माण परियोजना को लेकर अब सत्ताधारी दल के ही वरिष्ठ नेताओं और जिला प्रशासन के बीच घमासान शुरू हो गया है। जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक के उपाध्यक्ष एवं भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष भरत लाल वर्मा द्वारा राजनांदगांव कलेक्टर को लिखे गए पत्र (क्रमांक 1537, दिनांक 25/09/2026) ने लोक निर्माण विभाग (PWD) और ठेकेदार के बीच की कथित मिलीभगत को उजागर कर दिया है।

​लेकिन इस पत्र के सार्वजनिक होते ही राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर भाजपा नेता को अपनी ही सरकार के कार्यकाल में हो रहे सड़क निर्माण की दुर्दशा और भ्रष्टाचार की याद इतने दिनों बाद क्यों आई? क्या यह जनता के प्रति उमड़ा दर्द है या फिर इसके पीछे कोई पुरानी राजनीतिक गुटबाज़ी और लेन-देन की खींचतान छुपी है?

​पत्र में खुले भ्रष्टाचार के राज: 4 साल में भी अधूरी सड़क, उखड़ने लगा डामर

​भरत लाल वर्मा द्वारा कलेक्टर को सौंपे गए मांग पत्र में डोंगरगांव की चार लेन सड़क के निर्माण में गंभीर आरोप लगाए गए हैं:

​गुणवत्ताहीन निर्माण: 4 साल बीत जाने के बाद भी काम अधूरा है और सड़क बनने से पहले ही डामर की सतह उखड़ गई है। कई जगहों पर बड़े-बड़े गड्ढे हो चुके हैं और पैचवर्क दिखाई दे रहे हैं।

​तकनीकी मानकों की अनदेखी: सड़क निर्माण के दौरान GSB, WMM, सब-ग्रेड, डामरीकरण और बिटुमेन की मात्रा में भारी गोलमाल का आरोप लगाया गया है।

​अधिकारियों पर संरक्षण का आरोप: 4 सालों से काम अधूरा होने के बावजूद विभाग द्वारा ठेकेदार (लेखराम साहू) को बार-बार समयवृद्धि दी जा रही है। शिकायत मिलने के बाद भी कोई कार्रवाई न होने से यह स्पष्ट है कि विभाग और भ्रष्ट अधिकारियों की सांठगांठ से ठेकेदार को खुला संरक्षण मिल रहा है।

​गुंडागर्दी और एफआईआर: पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि ठेकेदार के पुत्र के विरुद्ध विभागीय कर्मचारियों से मारपीट और जान से मारने की धमकी देने के मामले में FIR दर्ज हुई थी, फिर भी अधिकारियों ने दबाव या भय के कारण कठोर कार्रवाई नहीं की।

​खराब ड्रेनेज व्यवस्था: जलभराव दूर करने के बजाय नई नालियों के निर्माण के बाद जलभराव की समस्या और बढ़ गई है।

​सत्ता के गलियारों में चर्चा: 'चढ़ावा और लिफाफा' या अपनी ही सरकार को घेरने की मजबूरी?

​राजनीतिक विश्लेषकों और आम चर्चाओं में यह सवाल भी जोर-शोर से उठ रहा है कि जो नेता भाजपा के जिलाध्यक्ष और संगठन के शीर्ष पदों पर रह चुके हैं, उनके रहते हुए विभागीय अधिकारियों का दुस्साहस इतना कैसे बढ़ गया?

स्थानीय स्तर पर यह चर्चा गरम है कि क्या भाजपाइयों को अब अपने पुराने दौर की याद आ रही है, जब काम कराने के नाम पर "भेंट-चढ़ावा और लिफाफे" का खेल चलता था? अपनी ही सरकार के 'सुशासन' के दावों के बीच एक पूर्व जिलाध्यक्ष द्वारा सड़क निर्माण में भारी भ्रष्टाचार का खुलासा करना यह दिखाता है कि ज़मीनी स्तर पर अफसरशाही किस कदर हावी है।

​प्रमुख मांगें: क्या कार्रवाई करेगी सरकार?

​भरत लाल वर्मा ने पत्र के माध्यम से निम्नलिखित कड़ी कार्रवाइयों की मांग की है:

​सड़क परियोजना की NABL मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला या स्वतंत्र तकनीकी संस्था से उच्चस्तरीय जांच (गुणवत्ता, मोटाई, बिटुमेन की मात्रा आदि)।

​4 साल की देरी और बार-बार दी गई समयवृद्धि के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय कर उन पर कार्रवाई।

​गड़बड़ी पाए जाने पर ठेकेदार (लेखराम साहू) और दोषी अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज की जाए।

​ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट (Blacklist) किया जाए।

​दोषपूर्ण ड्रेनेज प्रणाली का तकनीकी सुधार किया जाए।

​अब परीक्षा सरकार और प्रशासन की

​करोड़ों रुपये की सार्वजनिक धनराशि की बर्बादी और जनता की रोजमर्रा की परेशानी को लेकर उठे इन गभीर सवालों पर अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन इस पत्र को कितनी गंभीरता से लेते हैं। क्या भ्रष्ट अधिकारियों और ठेकेदार के गठजोड़ पर बुलडोजर चलेगा या फिर यह मामला भी केवल राजनीति और पत्राचार के पन्नों में दबकर रह जाएगा?