जगदलपुर। छत्तीसगढ़ का बस्तर अब अपनी नई पहचान गढ़ रहा है। कभी नक्सलवाद के नाम से चर्चा में रहने वाला बस्तर आज प्राकृतिक सुंदरता, जनजातीय संस्कृति और इको-टूरिज्म के कारण देश के नक्शे पर पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में उभर रहा है। पर्यटन अब यहां विकास और रोजगार का नया माध्यम बन रहा है।
प्रकृति और संस्कृति का संगम
बस्तर की सबसे बड़ी ताकत यहां प्रकृति और संस्कृति का संगम है। चित्रकोट और तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर घाटी नेशनल पार्क, कुटुमसर गुफा, मां दंतेश्वरी मंदिर और बस्तर पैलेस पर्यटकों को अलग ही अनुभव देते हैं। यहां पर्यटक सिर्फ घूमने नहीं आता, बल्कि स्थानीय खान-पान, हस्तशिल्प, लोकनृत्य और जनजातीय जीवन से भी जुड़ता है।
कनेक्टिविटी से खुल रहे नए रास्ते
पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कनेक्टिविटी पर जोर दिया जा रहा है। ‘बस्तर 2.0’ ब्लूप्रिंट में 228 नई सड़कों और 267 पुलों के निर्माण का प्रस्ताव है। जगदलपुर का मां दंतेश्वरी एयरपोर्ट बस्तर को रायपुर और हैदराबाद से जोड़ रहा है। वहीं रावघाट-जगदलपुर रेल परियोजना से भविष्य में कनेक्टिविटी और मजबूत होगी। इससे स्थानीय उत्पादों को बाजार और युवाओं को रोजगार मिलेगा।
होमस्टे से गांवों को फायदा
बस्तर में ग्रामीण होमस्टे पर्यटन की सबसे बड़ी कड़ी बन रहे हैं। छत्तीसगढ़ होमस्टे नीति 2025-30 के तहत पर्यटकों को स्थानीय परिवारों के साथ रहने का मौका मिल रहा है। इससे पर्यटन का पैसा सीधे गांव के लोगों तक पहुंच रहा है।
सरकार नए कमरे बनाने पर प्रति कमरा 1 लाख और पुराने कमरे के नवीनीकरण पर 50 हजार की सहायता दे रही है। अभी 85 लोगों को अनुदान के लिए प्रस्ताव भेजे गए हैं और 27 होमस्टे पर्यटन बोर्ड में पंजीकृत हैं।
संस्कृति बनी सबसे बड़ी ताकत
बस्तर की जनजातीय संस्कृति, बेलमेटल, बांस शिल्प और लोकनृत्य पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। बस्तर पंडुम 2026 में 12 जनजातीय विधाओं में करीब 55 हजार आदिवासियों ने हिस्सा लिया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की मौजूदगी ने बस्तर को राष्ट्रीय पहचान दी।
रोजगार के नए अवसर
होमस्टे संचालक, गाइड, ड्राइवर, हस्तशिल्प विक्रेता और कलाकार इस नई पर्यटन अर्थव्यवस्था से जुड़ रहे हैं। अब तक 45 युवाओं को पर्यटन प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जा चुका है। धुड़मारास गांव का यूएन टूरिज्म बेस्ट टूरिज्म विलेज के लिए चयन होना ग्रामीण पर्यटन की बड़ी उपलब्धि है।