ताड़मेटला कांड पर हाईकोर्ट सख्त: 16 साल में भी दोषियों की पहचान नहीं:

त्वरित खबरें ( अरुण रेपोर्टिंग )

छत्तीसगढ़ , के बहुचर्चित ताड़मेटला नरसंहार मामले में एक बार फिर न्याय व्यवस्था और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 16 साल पहले हुए इस भीषण नक्सली हमले में 76 जवान शहीद हो गए थे, लेकिन इतने लंबे समय के बाद भी जांच एजेंसियां आरोपियों की पहचान और उनके खिलाफ पुख्ता सबूत पेश करने में सफल नहीं हो सकीं। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस स्थिति को “बेहद पीड़ादायक” बताते हुए कड़ी नाराजगी जाहिर की है। अदालत की टिप्पणी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर देश के सबसे बड़े नक्सली हमलों में शामिल दोषियों तक कानून के हाथ क्यों नहीं पहुंच पाए।

ताड़मेटला नरसंहार अप्रैल 2010 में दंतेवाड़ा जिले के चिंतलनार क्षेत्र में हुआ था। नक्सलियों ने सुरक्षा बलों पर घात लगाकर हमला किया था, जिसमें CRPF और पुलिस के 76 जवान शहीद हो गए थे। यह घटना देश के इतिहास में सुरक्षा बलों पर हुए सबसे बड़े नक्सली हमलों में गिनी जाती है। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था और केंद्र से लेकर राज्य सरकार तक ने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दिलाया था। लेकिन समय बीतने के साथ जांच की रफ्तार धीमी पड़ती गई और अब 16 साल बाद भी मामला अधूरा नजर आ रहा है।

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि इतनी बड़ी घटना के बाद भी यदि एजेंसियां आरोपियों की पहचान साबित नहीं कर पा रही हैं, तो यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। अदालत ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि न्याय में देरी कहीं न कहीं पीड़ित परिवारों के साथ अन्याय के समान है। शहीद जवानों के परिजनों ने भी कई बार जांच में तेजी लाने और दोषियों को सजा दिलाने की मांग उठाई, लेकिन अब तक उन्हें केवल आश्वासन ही मिला है।

इस मामले ने देश में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जांच और सुरक्षा व्यवस्था की चुनौतियों को भी उजागर किया है। दूरस्थ इलाकों में साक्ष्य जुटाना, गवाहों तक पहुंचना और नक्सलियों की पहचान सुनिश्चित करना हमेशा से मुश्किल रहा है। हालांकि, इतने वर्षों बाद भी ठोस परिणाम सामने न आना एजेंसियों की गंभीर विफलता माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे मामलों में समय पर और प्रभावी जांच नहीं होगी, तो इससे सुरक्षा बलों का मनोबल भी प्रभावित हो सकता है।

ताड़मेटला कांड केवल एक नक्सली हमला नहीं, बल्कि उन 76 जवानों की शहादत की कहानी है जिन्होंने देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। आज भी उनके परिवार न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं। हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी ने इस मामले को फिर से चर्चा में ला दिया है और अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या जांच एजेंसियां आने वाले समय में दोषियों तक पहुंच पाएंगी या यह मामला हमेशा अधूरे न्याय की मिसाल बनकर रह जाएगा।