3 मार्च को लगने वाला है चंद्रग्रहण ,चंद्रग्रहण के दौरान देशभर के अधिकांश मंदिरों में सूतक काल के चलते कपाट बंद कर दिए जाएंगे.

त्वरित खबरें - दामिनी साहू रिपोर्टिंग

 3 मार्च को चंद्रग्रहण है.  देशभर के तमाम मंदिरों के कपाट चंद्रग्रहण के समय बंद कर दिए जाएंगे. इस दौरान मंदिरों में किसी भी देवी देवता की ना तो आरती होगी ना ही भोग या अन्य किसी प्रकार के पूजा की जाएगी. देश में अपवाद स्वरूप कुछ मंदिर हैं जहां सूर्य या चंद्र ग्रहण के समय लगने वाले सूतक काल के नियम नहीं लागू होते हैं. उन्हीं में एक राजस्थान के बीकानेर का भगवान लक्ष्मीनाथ मंदिर है.

 चंद्रग्रहण के दौरान देशभर के अधिकांश मंदिरों में सूतक काल के चलते कपाट बंद कर दिए जाएंगे. इस अवधि में न तो आरती होगी और न ही देवी-देवताओं को भोग लगाया जाएगा. आमतौर पर ग्रहण काल को धार्मिक दृष्टि से संवेदनशील समय माना जाता है. देश में कुछ ऐसे मंदिर भी हैं जहां ग्रहण के दौरान सूतक के नियम लागू नहीं होते. राजस्थान के बीकानेर स्थित भगवान लक्ष्मीनाथ मंदिर उन्हीं अपवादों में से एक है, जहां चंद्रग्रहण के समय भी मंदिर के कपाट खुले रहेंगे और नियमित पूजा-पाठ जा

ग्रहण काल में क्यों बंद किए जाते हैं मंदिरों के कपाट?

* ग्रहणकाल में लक्ष्मीनाथ मंदिर के कपाट क्यों नहीं बंद होते हैं?

*क्यों प्रसिद्ध है लक्ष्मीनाथ मंदिर?

* हिंदू धर्मग्रंथों के मुताबिक सूर्य या चंद्र ग्रहण के दौरान ब्रह्मांड में छाया ग्रह राहु और केतु का प्रभाव बढ़ जाता है. ऐसे में नकारात्मक ऊर्जा अग्रेसिव हो जाती है. वहीं मंदिर सकारात्मक ऊर्जा के केंद्र होते हैं. ग्रहण के समय को सूतक काल कहा जाता है. इसलिए ग्रहण के समय तमाम मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं.

* मान्यता है कि एक बार ग्रहण काल में लक्ष्मीनाथ मंदिर के कपाट बंद किया गया था. इस वजह से भगवान विष्णु और लक्ष्मी को तय समय पर भोग नहीं लगाया गया था. तब मंदिर के पास की एक हलवाई को भगवान लक्ष्मीनाथ सपने में आए. उन्होंने हलवाई से कहा कि उन्हें भूख लगी है. नींद से जागने के बाद हलवाई ने यह बात मंदिर के पुजारी को बताई. तब से परंपरा शुरू हो गई कि ग्रहण काल में लक्ष्मीनाथ मंदिर के कपाट कभी नहीं बंद किए जाते हैं. साथ ही ग्रहण काल में भी भगवान को तय समय पर भोग लगाया जाता है.

लक्ष्मी नाथ मंदिर बीकानेर के सबसे पुराने मंदिरों और लोकप्रिय जगह में से एक है. यह मंदिर भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित है, जहां दूर-दूर से हजारों पर्यटन और श्रद्धालु यहां लक्ष्मी नारायण का दर्शन पूजन करने उनकी भक्ति करने आते हैं. इस मंदिर का निर्माण विक्रम संवत 1526 में संपन्न हुआ. यह मंदिर पूरे 22 साल में बनकर तैयार हुआ. मंदिर की इमारत जैसलमेर के लाल बलवा पत्थरों और मकराना के संगमरमर के मिश्रण से बनी है. इस पर की गई खूबसूरत चित्रकारी अद्भुत जीवंत मूर्तियां और चांदी की अद्वितीय कलाकृतियां के कारण इस मंदिर की सुंदरता देखते ही बनती है. इसे महाराज राव लूणकरण ने बनवाया था.

भारत के इन मंदिरों में भी चंद्रग्रहण काल में नहीं लगते हैं कपाट

*महाकाल मंदिर: ज्योतिर्लिंग उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर के कपाट ग्रहण काल में बंद नहीं होते हैं. मान्यता है कि यहां भगवान शंकर कालों के काल महाकाल स्वरूप में विराजमान हैं. इसी वजह से ग्रहण हो या कोई और मौका यहां भगवान महाकाल के कपाट कभी नहीं बंद होते हैं.

*कालकाजी मंदिर: दिल्ली के प्रसिद्ध कालकाजी मंदिर कालचक्र की स्वामिनी मानी जाती हैं. मान्यता है कि सारे ग्रह नक्षत्र उनके कंट्रोल में हैं. इसी वजह से इस मंदिर में ग्रहण काल में कालकाजी मंदिर के कपाट नहीं बंद किए जाते हैं. साथ ही भक्त उनकी पूजा-पाठ भी करते हैं.

*विष्णुपद मंदिर: बिहार के गयाजी में विष्णुपद मंदिर है. यहां भक्त अपने पितरों का पिंडदान करते हैं. मान्यता है कि विष्णुपद मंदिर में विराजमान भगवान विष्णु पर ग्रहण का कोई प्रभाव नहीं होता है. इसलिए यहां ग्रहण काल में भी पिंडदान प्रक्रिया जारी रहती है.

*कल्पेश्वर मंदिर: उत्तराखंड में स्थित कल्पेश्वर मंदिर के कपाट भी ग्रहण कल में बंद नहीं होते हैं. मान्यता है कि भगवान भोले नाथ इसी मंदिर में बैठकर मां गंगा की धार को धरातल पर कंट्रोल करते हैं. इसी वजह से यहां कपाट नहीं बंद होते हैं और ग्रहण काल में भी पूजा निरंतर जारी रहती है.

*थिरुवरप्पु कृष्ण मंदिर: केरल के कोट्टायम के थिरुवरप्पु में भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर है. मान्यता है कि यहां विराजमान भगवान कृष्ण पर ग्रहण का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है. इसलिए ग्रहण काल में भी यहां भगवान को भोग आदि लगाए जाने की प्रक्रिया जारी रहती है.