वर्ष के अंतिम महीने (दिसंबर 2025) में सर्वोच्च न्यायालय के नए नियम मुख्य रूप से मामलों के प्रबंधन, तत्काल सुनवाई और उल्लेख (mentioning) की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए जारी किए गए हैं। ये नियम विशेष रूप से निम्नलिखित प्रकार के मामलों पर लागू होते हैं:
नए नियम जिन मामलों पर लागू होते हैं
1 दिसंबर 2025 से प्रभावी नए नियमों के तहत, निम्नलिखित श्रेणियों के मामलों को त्वरित सुनवाई (आमतौर पर दो कार्यदिवसों के भीतर) के लिए स्वचालित रूप से सूचीबद्ध किया जाएगा, बशर्ते दस्तावेज़ीकरण पूरा हो:
जमानत (Bail): नियमित जमानत, अग्रिम जमानत और जमानत रद्द करने से संबंधित याचिकाएं।
बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus): व्यक्तियों की स्वतंत्रता से जुड़े मामले और अवैध हिरासत के खिलाफ याचिकाएं।
बेदखली और ध्वस्तीकरण (Eviction and Demolition): बेदखली या संपत्ति को गिराने से संबंधित मामले।
तत्काल अंतरिम राहत: कोई भी अन्य मामला जिसमें तत्काल अंतरिम राहत की आवश्यकता हो।
मौत की सज़ा (Death Penalty): मृत्युदंड से संबंधित मामले।
प्रक्रियागत बदलाव
ये नियम किसी विशेष कानूनी बिंदु के बजाय अदालत के कामकाज के तरीके को बदलते हैं:
उल्लेख (Mentioning): तत्काल सुनवाई के लिए मामलों का मौखिक उल्लेख अब केवल रिकॉर्ड के वकीलों (Advocates-on-Record - AoR) द्वारा ही किया जा सकता है, न कि वरिष्ठ अधिवक्ताओं (Senior Advocates) द्वारा।
स्थगन (Adjournment): मामलों को स्थगित करने की मांग करने वाले पत्रों पर अब सख्ती बरती जाएगी और बिना पूर्व सूचना के स्थगन मुश्किल होगा।
सरकारी मामलों में अग्रिम प्रति: जमानत से जुड़े मामलों में केंद्र सरकार को याचिका की अग्रिम प्रति भेजना अनिवार्य कर दिया गया है।
इन बदलावों का उद्देश्य "तारीख पर तारीख" की प्रथा को कम करना और लंबित मामलों की संख्या को घटाना है, खासकर उन मामलों में जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता दांव पर है। इन नियमों के बारे में अधिक जानकारी के लिए, आप भारत के सर्वोच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर संबंधित परिपत्र (circulars) और नोटिस देख सकते हैं।