राजनांदगांव :- युवा कवि की प्रौढ़ कृति: 'और वह चला गया' (डॉ शंकर मुनि राय)यह वीरेंद्र कुमार साहू की कुल 22 कविताओं का संग्रह है। सब की सब अतुकांत, और मार्मिक संवेदना से युक्त! यद्यपि यह वीरेंद्र का पहला काव्य संग्रह है, किन्तु कविता में रचनाकार की प्रौढ़ता शुरू से ही दिखाई दे रही है। कविताओं के शीर्षक जिज्ञासा प्रकट करने वाले हैं। संग्रह में कविताओं का क्रम इस प्रकार है - नदी बनकर जीना, मां भूखी है, चाहता हूं, इसे हार मत समझ लेना, मनुष्य और देवता, संभावित घटना, मैं लड़ूंगा, मैं सीख रहा हूं, तुम्हारा हाथ, कितना कमा लेते हो, मैं लौट आता हूं, मेरी मौत, अनसुना वक्ता, और वह चला गया, कहां भाग रहे हो, थोड़ा रुक कर चलूं, आसमान का एक टुकड़ा, अखबार वाला, तीन सपने, सुना है, अकेलापन और अंत में है तुम फिर आना।किसी भी कवि की पहली रचना में प्रेम और श्रृंगार की संभावना से परे वीरेंद्र की शुरुआती चेतना ही युगीन परिस्थितियों से उभरी हैं। यह विचार इस संग्रह के शीर्षक वाली कविता में ही दिख रहा है। कवि की चिंता है कि नवीन गढ़ने के नाम पर पुरातन का उपहास उसे कचोट रहा है। कवि उसे रोकना चाहता है -"उसे रोको / वह जा रहा है / शहर की / भीड़ भरी गलियों से /गुजरते हुए / अकेले ही / चौराहे की मूर्ति / विशाल बरगद का पेड़ / तहसील का दफ्तर / पुलिस थाना / सरकारी अस्पताल / सन इकहत्तर का विद्यालय / दशहरा मैदान / पुराना तालाब / शिवजी का मंदिर / चूड़ियों की दुकानें / पुरानी सब्जी मंडी / बस अड्डा / चाय के ठेले / कोई तो / उसे रोक लो / वह ज्यादा दूर नहीं गया होगा।"'मां भूखी है' शीर्षक कविता मां की महनीयता प्रदर्शित करने वाली एक प्रतिकात्मक कविता है। प्रकृति की रचना में ममता चाहे पशु-पक्षियों की हो या मनुष्य की महानता की दृष्टि से सब एक समान ही हैं। इस रोजगारी दुनिया में संतान का विछोह मां से अधिक कोई नहीं समझ सकता है, प्रतिकात्मक पंक्ति देखिए -पंखों का उगना / उगकर उड़ना / प्रकृति को दृश्य है / पर / ममता को नहीं / बच्चे उड़ चले / अनंत की ओर / मुंह में दाना लिए /मां भूखी है।"युवा कवि की 'तुम्हारा हाथ' शीर्षक कविता श्रृंगार-संकेतक है। किन्तु इसकी प्रौढता दार्शनिक चेतनायुक्त है-" मैं जब / तुम्हारा हाथ थामूंगा / तब / हमारी हथेलियों की / जीवन रेखा / हृदय रेखा / भाग्य रेखा / और कितनी ही / अनगिनत सीधी, आड़ी-तिरछी / एक-दूसरे को काटती हुई रेखाएं / अदृश्य हो जाएंगी ।" इस संग्रह की ' मेरी मौत ' शीर्षक कविता को मैं प्रेमपरक कविता मानता हूं। इस कविता की बुनावट प्रेम के उस सतह पर है जहां प्रेमी को प्रेयसी और मातृभूमि दोनों के लिए मरना अनिवार्य हो जाता है। कविता के आधार पर कल्पना करें कि जब एक सैनिक के सीने में गोली लगती है तो वह क्या सोचता होगा। आप चाहें जो कुछ भी सोचने के लिए स्वतंत्र हैं, पर वीरेंद्र की सोच देखकर दंग रह जाएंगे -
'' जब मुझे गोली लगी / तब मैं तुरंत नहीं मरा था / गोली लगने और / मरने से ठीक पहले / उस
छोटे से जीवन ने / मुझे फिर से एक बार / तुम्हें याद करने का / मौका दे दिया था।"
'तीन सपने' तो ऐसी रचना है जो युवा कवि को दार्शनिक और उपदेशक दोनों एक साथ साबित कर रही है -
"एक सपना / ऐसा देखो / जिसे तुम कभी सच न कर सको / ताकि मन में / कल्पनाशीलता जिंदा रहे / और एक सपना / ऐसा देखो / जिसे तुम सच कर सको या शायद नहीं / ताकि जिंदगी का / मतलब जिंदा रहे।"
यहां बताना जरूरी है कि वीरेंद्र पहले से ही डाक्टर (पशु-चिकित्सक) हैं, और इन दिनों मेरे हिंदी शोध केंद्र में अनुसंधानरत विद्यार्थी हैं। इनकी ये सभी कविताएं तब की हैं जब ये वेटनरी में स्नातकोत्तर पढ़ाई कर रहे थे। जीवन को समझने का इनका अंदाज शुरू से ही दार्शनिक है। इनका मानना है कि प्रेम, खुशी, दुख, निराशा, संघर्ष, एकाकीपन, उत्सव, सफलता, असफलता जैसे अनेक रंगों को जीवन अपने आप में समेटे हुए है।
आपने अपनी कविताओं में इन्हीं रंगों से काव्यकारी की है।
इस संग्रह को पढ़ते हुए मैं महसूस कर रहा हूं कि जो लोग आज कवि और कविता का माखौल उड़ाते हैं, उपहास करते हैं, वे जीवन की संवेदनात्मक दुनिया से बहुत दूर रहने वाले लोग होते होंगे। कविता की दुनिया ही अलग है, इसमें निजता, स्वार्थ और क्षुद्रता के लिए किंचित स्थान नहीं है। कविता की दुनिया में जीने वाला अपने आप को कविता बना देता है। इस संग्रह की अंतिम कविता 'तुम फिर आना ' में कवि की यही इच्छा है कि जब 'तुम फिर आना' तब ऐसे आना कि-
"एक पूरा दिन / तुम्हारी याद में गुजर जाए / सुखमय शाम बनकर / तुम फिर आना / हो अंधेरा इतना कि / खुद को न पहचान पाऊं / रोशनी बनकर / तुम फिर आना।"
इतना ही नहीं, कवि चाहता है कि 'तुम आना' तो कविता बनकर ही आना, इस प्रकार -
"भूमि छोड़ समंदर बन जाऊं / तब मुझसे मिलने / सरिता बनकर / तुम फिर आना / कह न सकूं कोई बात / तुमसे भी मैं / तब / कविता बनकर / तुम फिर आना।"
मात्र छियालीस पृष्ठ की इस काव्य-कृति को पढ़ने वाला कोई भी सुधि पाठक अंत में यही कहेगा -
"वाह! शाबाश! शानदार संग्रह! अनेकानेक शुभकामनाएं वीरेंद्र!"