राजनांदगांव। महिला सशक्तिकरण संघ एवं धम्मकीर्ति बुद्ध बिहार बसंतपुर राजनांदगांव द्वारा संयुक्त रूप से ०१ जनवरी शौर्य दिवस ०३ जनवरी सामाजिक क्रांति की महानायिका प्रथम महिला शिक्षक सावित्री बाई फूले जयंती एवं ०५ जनवरी डॉ. भदन्त आनंद कौशिल्यान जन्म जयंती बसंतपुर बिहार में मनायी गई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कन्हैया लाल खोब्रागढ़े जी वरिष्ठ समाजसेवी, विशिष्ट अतिथि श्रीमती जानकी रंगारी, नंदा मेश्राम जी, लक्ष्मा गजभिए जी, डॉ. सुजाता वासनिक जी, डॉ. संध्या दामले जी, अतिथियों ने शौर्य स्तम्भ एवं महापुरूषों के तैलचित्रों के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर माल्यापर्ण किया। सभी अतिथियों को प्रशस्ति पत्र एवं पौधा सम्मान में दिया गया। कार्यक्रम की शुरूआत और आभार वक्तव्य बुद्धमित्रा वासनिक अध्यक्ष ने की एवं संचालन सुनीता ईलमकर ने किया।महिला सशक्तिकरण संघ द्वारा आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कन्हैया लाल खोब्रागढ़े जी ने कहा ०१ जनवरी १८१८ भीमा कोरेगाँव शौर्य दिवस पर प्रकाश डाला शुरवीर अपने पूर्वजो जिन्होंने अपने ऊपर किये गये अन्याय एवं अत्याचार का बदला लेने के लिये रसद व अस्त्र शस्त्र की कमी के बावजुद ५०० सैनिकों ने पेशवा की सेना २५,००० को परास्त कर अपने पूर्वजों के अपमान का बदला लिया।डॉ. भदन्त आनंद कौशिल्यान का जन्म अम्बाला में खत्री परिवार में हुआ। वे शहीद भगत सिंह के सहभागी थे वे २१ वर्ष की उम्र में घर छोड़कर देशाटन में निकल गये थे। १९५६ में नेपाल में आयोजित चतुर्थ बौद्ध सम्मेलन में सम्मिलित हुए उनकी मुलाकात डॉ. भीमराव आम्बेडकर के साथ हुई, उन्होंने श्रीलंका में पाली भाषा में त्रिपिटक का गहन अध्ययन किया।जानकी रंगारी जी, नंदा मेश्राम जी, लक्ष्मा गजभिए जी तथा भदन्त धम्मपाल जी ने कहा कि माता सावित्री बाई फूले का जन्म ०३ जनवरी १८३१ नायगाँँव महाराष्ट्र में हुआ था। वह बचपन से ही बहुत ही बहादुर थी उनका ९ वर्ष की आयु में ज्योतिबा फूले से १८४० में विवाह हो गया। उन्हें शिक्षा, संपत्ति आत्म सम्मान से वंचित किया गया। स्त्रियों की दशा और भी खराब थी धार्मिक पाखंड, अंधविश्वास, रूढि़वाद, अपृश्यता बहु विवाह, बाल विवाह, अनमेल विवाह महिलाओं और शुद्रो के शारीरिक और मानसिक शोषण होता था सावित्री बाई फूले एवं ज्योतिबा फूले इन सबके खिलाफ काम किया। भारत की प्रथम महिला शिक्षिका बनी। ०१ जनवरी १८४८ में पहला स्कूल भिड़ेवाडा पुणे में शुरू किया। सावित्री बाई एवं ज्योतिबा फूले को घर से बेघर कर दिया गया फिर भी वे अपने शिक्षा के लिये पीछे नही हटे जब वह अध्यापिका बनी एवं स्कूल जाती तो उस पर कीचड़, गोबर मल मूत्र फेंक देते व पत्थर मारकर सिर लहूलुहान कर देते उसके बाद भी स्कूल का रिजल्ट अच्छा आता। उन्होंने १८ स्कूल खोलें तथा १८५२ में महिला मण्डल का गठन कर उनकी दशा सुधारने के लिये संस्थागत कार्य किया। विधवा मुण्डन पर रोक लगायी। १९७६ में महाराष्ट्र में अकाल पडऩे पर अनाज संग्रहण योजना बनाकर गरीबों को अनाज का वितरण किया। बाद में पक्का भोजन बांटने के ५२ केन्द्र खोले। ज्योतिबा फुले सत्यशोधक समाज की स्थापना की। उनकी मृत्यु के बाद पति का अंतिम संस्कार स्वंय किया। १८९७ में प्लेग फैलने पर सत्यशोधक समाज के कार्यकर्ताओं और पुत्र यशवंत राव की मदद से रोगियों की सेवा की। रोगियों की सेवा करते हुए स्वंय भी प्लेग से संक्रमित हो गयी। १० मार्च १८९७ में उनका निधन हो गया।कार्यक्रम में मुख्य रूप से माया वासनिक, सुशांत कुमार पत्राकार, माया खोब्रागढ़े, हर्षिका गजभिए, मीना खोब्रागढ़े, सविता जामुलकर, वंदना मेश्राम, देवपाल रामटेके, एम.बी अनोखे, पुष्पा सांवरकर, आशा जामुलकर, रविता लकड़ा, वंदिता गजभिए, वंदना बोरकर, बिन्दा डोंगरे, शारदा मेश्राम, सुनीता सिंह, सुनीता बारसे, पूर्णिमा नागदेवे, प्रियांकी गजभिए, निर्मला रामटेके, सुनीता मेश्राम, सरला नोन्हारे, शिला शेण्डे, माला उके, प्रशांत सुखदेवे, रितेश गजभिए, दयाल मेश्राम, अजय डोंगरे, कौशल खोब्रागढ़े, मिलिंद एवं सभी सदस्य अधिक संख्या में उपस्थित थे।