नवा रायपुर में जंगल सफारी के पास 200 एकड़ में बना पुरखौती मुक्तांगन की ज्यादातर मूर्तियां बदरंग हो चुकी हैं। सीमेंट की कई प्रतिमाओं के हाथ-पांव टूटकर गायब हो चुके हैं। मेटल की मूर्तियों के हाथ-पांव को जंग खा चुका है। ये मूर्तियां लंगड़ी-लूली हो चुकी है। दशहरे के मौके पर बस्तर में बनाए जाने वाले दहशरा रथ की नकल खासतौर पर बस्तर आर्ट को प्रदर्शित करने के लिए यहां बनाई गई थी, अब यह केवल लकड़ी का ढांचा बनकर रह गई है। कबीरधाम के भोरमदेव के मंदिर की प्रतिकृत की जगह सिर्फ ईंट और फाईबर के शीट का ढांचा रह गया है।
इसकी जीर्णशीर्ण दशा देखकर लगता ही नहीं कि यह देश और विदेश में प्रसिद्ध भोरमदेव के मंदिर की अनुकृति है। नवा रायपुर में एक समय शोभा रह चुके पुरखौती मुक्तांगन की मूर्तियों के कलर उधड़ जाने की वजह से उनका स्वरुप ही बिगड़ गया है।
रही सही कसर टूट-फूट ने पूरी कर दी है। सीमेंट की मूर्तियों का जो हिस्सा टूटा है, वहां लोहे के एंगल दिखते हैं। पर्यटन और संस्कृति विभाग को निगरानी और मेंटेनेंस की जिम्मेदारी है। यहां प्रवेश द्वार में एंट्री करते ही आभास हो जाता है कि यहां मेंटेनेंस किस तरह से किया जा रहा है। पड़ताल में पता चला है कि प्रदेश की कला-संस्कृति और स्मृतियों को संजाए रखने की गरज से करीब 200 एकड़ में तैयार की गई पुरखौती मुक्तांगन में अलग-अलग चरणों में अब तक 20 करोड़ खर्च किए जा चुके हैं।
2020 में शहीद वीरनारायण सिंह संग्रहालय और मानव संग्राहलय तैयार करने के लिए सरकार ने 25.66 करोड़ रुपए स्वीकृत किए थे। प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी ने सितंबर 2002 में इसकी नींव रखी और नवंबर 2006 में राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम ने इसका लोकार्पण किया था। यह एक तरह का खुला संग्रहालय जैसा है। यहां बस्तर और प्रदेश की आदिवासी अंचलों की संस्कृति तथा रहन सहन को प्रतिमाओं इत्यादि के माध्यम से रेखांकित किया गया।
पुरखौती मुक्तांगन में क्रांतिकारी शहीद वीर नारायण सिंह स्मारक और मानव संग्रहालय बनाने का प्लान है। सालभर पहले विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस प्रोजेक्ट्स का ई-शिलान्यास किया। 25.66 करोड़ रुपए की लागत से यह तैयार किया जाएगा। अफसरों का कहना है कि छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद वीर नारायण सिंह की स्मृति में बनने वाले स्मारक से आने वाली पीढ़ियां आदिवासी समाज के इतिहास और आजादी की लड़ाई में उनके योगदान को जानेगी।
यहां बनने वाले संग्रहालय में प्रदेश की हजारों वर्षों में विकसित गौरवशाली सांस्कृतिक चीजों को लोग देख सकेंगे। विलुप्त हो रही सांस्कृतिक परम्पराओं के संरक्षण के लिहाज से ऐसे प्रयास को जरूरी बताया जा रहा है। राज्य की पारंपरिक जीवन शैली की सुंदरता और यहां के आदिवासियों के बारे में पूरी जानकारी इस म्यूजियम में मिलेगी।
मेंटनेंस नहीं होने के कारण मूर्तियां खराब, बदरंग और खंडित हो गईं
राजधानी और दूसरे प्रदेशों से आने वाले लोगों के लिए एक नजर में प्रदेश की कला, संस्कृति और यहां के आदिवासी जनजीवन को समझने की यह अच्छी जगह है। रोज दो से तीन सौ लोग यहां घूमने जाते हैं। छुट्टी के दिनों में आने वाले पर्यटकों की संख्या हजार से ऊपर पहुंच जाती है। महीने का करीब सवा दो लाख से ज्यादा का कलेक्शन टिकट बेचकर आता है। मेंटनेंस नहीं होने के कारण मूर्तियां बदरंग और खंडित हो गई हैं।
सीमेंट इत्यादि से बनी और काफी साल होने के कारण प्रतिमाएं खंडित हो रही हैं। प्रतिमाओं के हाथ-पैर से प्लास्टर और सीमेंट झड़ रहे हैं। उनकी मरम्मत और रंगरोगन के लिए टेंडर जारी कर दिया गया है। जल्द ही इसका काम शुरू हो जाएगा।-जेआर भगत, उपसंचालक संस्कृति विभाग
2016 में डेढ़ करोड़ खर्च कर बनाया आमचो बस्तर
बस्तर की आदिवासी संस्कृति और जनजीवन तथा यहां आदिवासियों के देवी-देवताओं और धार्मिक स्थलों को दर्शाती हुई बस्तर थीम पर पांच एकड़ में आमचो बस्तर तैयार किया गया है। करीब डेढ़ करोड़ खर्च से तैयार आमचो बस्तर का 2016 में पूर्वमुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने लोकार्पण किया था। नया निर्माण होने के कारण यहां की स्थिति ठीक है। यहीं पास में सरगुजा पैलेस की प्रतिकृति बनाई जा रही है। पर अभी काम अधूरा है।