बिलासपुर -छात्रों से स्कूल में रंगाई–पुताई कराने के मामले में शासन ने सख्त रुख अपनाया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने संबंधित स्कूल की प्राचार्य को पद से हटाने की जानकारी दी है। वहीं, प्रदेश में आरटीई (शिक्षा का अधिकार अधिनियम) के तहत निजी स्कूलों में मिलने वाली सीटों की संख्या में आई कमी को लेकर भी कोर्ट ने नाराजगी जताई है और इस संबंध में शिक्षा विभाग के सचिव से व्यक्तिगत हलफनामा प्रस्तुत करने को कहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने शिक्षा व्यवस्था और स्कूलों में बच्चों के अधिकारों को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।जानकारी के अनुसार, हाल ही में एक स्कूल में छात्रों से रंगाई–पुताई का काम कराए जाने का मामला सामने आया था। इस घटना का वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं, जिसके बाद शिक्षा विभाग और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे। आरोप है कि स्कूल प्रबंधन की ओर से बच्चों से कक्षा और स्कूल परिसर में पेंटिंग और रंगाई का काम करवाया गया, जो कि शिक्षा के अधिकार और बाल सुरक्षा से जुड़े नियमों का उल्लंघन माना जाता है। इस मामले के सामने आने के बाद शिक्षा विभाग ने जांच शुरू की और जिम्मेदार अधिकारियों से रिपोर्ट तलब की गई।सरकार की ओर से कोर्ट को जानकारी दी गई कि मामले में संबंधित प्राचार्य के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है और उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। शासन ने यह भी स्पष्ट किया कि स्कूलों में छात्रों से किसी भी प्रकार का श्रम या गैर-शैक्षणिक कार्य कराना नियमों के खिलाफ है और ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जाएगी। अधिकारियों का कहना है कि बच्चों का प्राथमिक अधिकार शिक्षा प्राप्त करना है और उन्हें किसी भी प्रकार के काम में लगाना उनकी गरिमा और अधिकारों के खिलाफ है।
इस मामले के साथ ही आरटीई के तहत निजी स्कूलों में गरीब और कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या में आई कमी का मुद्दा भी सामने आया है। आरटीई कानून के तहत निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित होती हैं, ताकि उन्हें भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। लेकिन हाल के आंकड़ों में इन सीटों की संख्या में कमी देखी गई, जिस पर कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है।कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए शिक्षा विभाग के सचिव से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा है। अदालत ने कहा कि आरटीई सीटों में कमी क्यों आई, इसके पीछे क्या कारण हैं और सरकार इस समस्या के समाधान के लिए क्या कदम उठा रही है, इसकी पूरी जानकारी हलफनामे के माध्यम से दी जाए। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि बच्चों के अधिकारों की अनदेखी हुई है, तो जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।शिक्षा के अधिकार कानून का उद्देश्य देश के हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण और समान अवसर वाली शिक्षा उपलब्ध कराना है। इसके तहत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है। साथ ही निजी स्कूलों में भी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए सीटें आरक्षित करने का प्रावधान रखा गया है, ताकि सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को कम किया जा सके। ऐसे में आरटीई सीटों की संख्या में कमी को शिक्षा व्यवस्था के लिए चिंताजनक माना जा रहा है।शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूलों में बच्चों से रंगाई–पुताई या अन्य श्रम कार्य कराना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह बच्चों के मानसिक और शैक्षणिक विकास पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। स्कूलों का वातावरण बच्चों के लिए सुरक्षित और प्रेरणादायक होना चाहिए, जहां वे पढ़ाई और रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से आगे बढ़ सकें। यदि स्कूल प्रबंधन ही नियमों की अनदेखी करेगा, तो इसका गलत संदेश समाज में जाएगा।वहीं, आरटीई सीटों में कमी का मुद्दा भी गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए चिंता का विषय बन गया है। कई अभिभावकों ने आरोप लगाया है कि निजी स्कूलों में आरटीई के तहत प्रवेश पाने में पहले ही कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, और यदि सीटों की संख्या ही कम हो जाएगी तो इन बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा के अवसर और भी सीमित हो जाएंगे।सरकार और शिक्षा विभाग का कहना है कि आरटीई से जुड़े मामलों की लगातार समीक्षा की जा रही है और यदि कहीं भी नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। अधिकारियों ने यह भी आश्वासन दिया है कि गरीब और जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे।फिलहाल, छात्रों से रंगाई–पुताई कराने के मामले में प्राचार्य को हटाने की कार्रवाई और आरटीई सीटों में कमी को लेकर शिक्षा सचिव से मांगे गए व्यक्तिगत हलफनामे के बाद यह मामला काफी चर्चा में है। अब सभी की नजर कोर्ट की अगली सुनवाई और सरकार की ओर से दिए जाने वाले जवाब पर टिकी हुई है। माना जा रहा है कि इस मामले के बाद स्कूलों में बच्चों के अधिकारों और शिक्षा से जुड़े नियमों के पालन को लेकर और सख्ती देखने को मिल सकती है।